श्री राम कथा के अंतरराष्ट्रीय वक्ता पूज्य श्री मणिराम दास जी महराज जी श्री किशोरी जी की विदाई प्रसंग को बड़े ही श्रद्धा भक्ति उमंग उत्साह के साथ सभी श्रद्धालुओं को श्रवण करा रहे थे।

कथा प्रसंग में श्री महराज जी ने सभी श्रोताओं को संबोधित करते हुए कि गोस्वामी श्री तुलसीदास जी ने श्री रामचरितमानस जी में श्री सीताराम जी के विवाह महोत्सव का वर्णन बहुत सुंदर भाव से किया हैं। ठीक उसी प्रकार से हमारे श्री सदगुरुदेव भगवान प्रेमावतार पञ्चरसाचार्य श्रीमद् स्वामी श्री राम हर्षण दास जी महराज जी ने भी श्री प्रेम रामायण महाकाव्य में श्री सीताराम विवाह महोत्सव का वर्णन किया है ।

भगवान श्री सीताराम जी का विवाह जितना विधिवत, जितना वैदिक और जिस रीति रिवाज से हुआ हैं वैसा विवाह ना कभी हुआ और ना किसी का होगा। आप सब रामचरिमानस पढ़ सकते हैं। जनक जी ने बरातियों का बहुत स्वागत किया है । जैसे हिमवान ने शिवजी को पार्वतीजी और सागर ने भगवान विष्णु को लक्ष्मी जी को दिया था, वैसे ही जनकजी ने श्री रामचन्द्रजी को श्री किशोरी जी को समर्पित किया, जिससे विश्व में सुंदर नवीन कीर्ति छा गई।

श्री रामजी और श्री किशोरी जी की सुंदर परछाहीं मणियों के खम्भों में जगमगा रही हैं, मानो कामदेव और रति बहुत से रूप धारण करके श्री रामजी के अनुपम विवाह को देख रहे हैं। प्रतिदिन हजारों प्रकार से मेहमानी होती है। काफी दिन बीत गए हैं। नगर में नित्य नया आनंद और उत्साह रहता है, दशरथजी का जाना किसी को नहीं सुहाता। दशरथ जी जाना चाहते है लेकिन इतना प्रेम दे रहे हैं की जाने नही देते। इस प्रकार बहुत दिन बीत गए, मानो बाराती स्नेह की रस्सी से बँध गए हैं। तब विश्वामित्रजी और शतानंदजी ने जाकर श्री विदेह राज जनक जी को समझाकर कहा-यद्यपि !आप स्नेह वश उन्हें नहीं छोड़ सकते, तो भी अब दशरथजी को आज्ञा दीजिए।

श्री विदेह राज श्री जनक जी ने कहा- अयोध्यानाथ चलना चाहते हैं, भीतर (रनिवास में) खबर कर दो। यह सुनकर भईया श्री लच्छमीनिधी जी भाभी श्री सिद्धि कुंवरि जी ,ब्राह्मण, सभासद और श्री विदेह राज जनक जी भी प्रेम के वश हो गए। जब नकपुरवासियों ने सुना कि बारात जाएगी, तब वे व्याकुल होकर और उदास हो गए हैं।

श्री ग जनक जी महराज ने फिर अपरिमित दहेज दिया, जो कहा नहीं जा सकता और जिसे देखकर लोकपालों के लोकों की सम्पदा भी थोड़ी जान पड़ती थी। बारात चलेगी, यह सुनते ही सब रानियाँ ऐसी विकल हो गईं, मानो थोड़े जल में मछलियाँ छटपटा रही हों। बार-बार श्री किशोरी जी को गोद में लेती हैं और आशीर्वाद देकर सिखावन देती हैं- तुम सदा अपने पति की प्यारी होओ, तुम्हारा सोहाग अचल हो, हमारी यही आशीष है। सास, ससुर और गुरु की सेवा करना। पति का रुख देखकर उनकी आज्ञा का पालन करना। सयानी सखियाँ अत्यन्त स्नेह के वश कोमल वाणी से स्त्रियों के धर्म सिखलाती हैं।

आदर के साथ सब पुत्रियों को (स्त्रियों के धर्म) समझाकर रानियों ने बार-बार उन्हें हृदय से लगाया। माताएँ फिर-फिर भेंटती और कहती हैं कि ब्रह्मा ने स्त्री जाति को क्यों रचा। तभी मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राघवेन्द्र सरकार जनक जी से विदा मांगने के लिए महलों की और चले हैं।

राम बिदा मागत कर जोरी।
कीन्ह प्रनामु बहोरि बहोरी।।
पाइ असीस बहुरि सिरु नाई। भाइन्ह सहित चले रघुराई॥
तब श्री रामचन्द्रजी ने हाथ जोड़कर विदा माँगते हुए बार-बार प्रणाम किया। आशीर्वाद पाकर और फिर सिर नवाकर भाइयों सहित श्री रघुनाथजी चले।

भए बिकल खग मृग एहि भाँती।
मनुज दसा कैसें कहि जाती॥ बंधु समेत जनकु तब आए।
प्रेम उमगि लोचन जल छाए॥
जब पक्षी और पशु तक इस तरह विकल हो गए, तब मनुष्यों की दशा कैसे कही जा सकती है! तब भाई सहित श्री जनक जी महराज वहाँ आए। प्रेम से उमड़कर उनके नेत्रों में (प्रेमाश्रुओं का) जल भर आया॥

सीय बिलोकि धीरता भागी।
रहे कहावत परम बिरागी॥
लीन्हि रायँ उर लाइ जानकी। मिटी महामरजाद ग्यान की॥
सज्जनों!
श्री विदेह राज जी महाराज
परम वैराग्यवान कहलाते थे, पर श्री किशोरी जी को देखकर उनका भी धीरज भाग गया। श्री विदेह राज जी श्री किशोरी जी को हृदय से लगा लिया। (प्रेम के प्रभाव से) ज्ञान की महान मर्यादा मिट गई (ज्ञान का बाँध टूट गया)॥

जनक जी जो देह से ऊपर(विदेह) हैं वो ही रो पड़े हैं। और श्री लाडली किशोरी जी भी बहुत रो रही हैं। जब पालकी मंगवाई गई हैं और डोली चली है तो भूल गए हैं की मैं ज्ञानी हूँ। मैंने लोगो को ज्ञान दिया हैं। पीछे पीछे दौड़ रहे हैं। और जानकी-जानकी पुकार रहे हैं।

जब दशरथ जी ने देखा तो अपना रथ रोक दिया हैं और इनकी नेत्रों में भी आंसू आ गए हैं। अब जनक जी दशरथ जी को कहते हैं की आज मैं आपको अपनी बेटी नही दे रहा हूँ। अपने प्राण दे रहा हूँ। और एक निवेदन हाथ जोड़कर श्री राम जी से भी करते हैं।

बार बार मागउँ कर जोरें। मनु परिहरै चरन जनि भोरें॥

मैं बार-बार हाथ जोड़कर यह माँगता हूँ कि मेरा मन भूलकर भी आपके चरणों को न छोड़े।

इस प्रकार से जनक जी ने जानकी जी को विदा किया है।

🚩🚩बोलिए श्री लाडली किशोरी जी की की जय ।।🚩🚩
आप सभी लोगों के स्नेह प्रेम और गुरुजनों के आशीर्वाद का आकांछी_ संगीतमय श्री राम कथा श्रीमद् भागवत कथा श्री प्रेम रामायण महाकाव्य जी की कथा के सरस गायक-
दासानुदास- मणिराम दास
संस्थापक/अध्यक्ष- श्री सिद्धि सदन परमार्थ सेवा संस्थान एवं ज्योतिष परामर्श केंद्र श्री धाम अयोध्या जी
संपर्क सूत्र-६३९४६१४८१२/९६१७५४४४२८

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